फूंक दिए 263 करोड़ लेकिन हालात जस के तस

गंगा सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि भारत की संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। इसे कई राज्यों की लाइफलाइन भी कहा जा सकता है।  गंगा का पानी सिर्फ खेती के काम ही नहीं आता है बल्कि करोड़ों लोगों की प्यास भी बुझाता है। वर्ष 2017 में 433 करोड़ की नमामि गंगे परियोजना कानपुर में इसलिए शुरू की गई थी, जिससे गंगा की सेहत सुधर जाए। सीसामऊ नाले को गंगा में गिरने से रोकने के लिए 63 करोड़ खर्च हुए। सीवर लाइनों की सफाई, मरम्मत व नई लाइनों के निर्माण पर 200 करोड़ से अधिक का भुगतान हो चुका है।

इसके बाद भी स्थिति जस की तस है। यानी, 263 करोड़ रुपये अब तक खर्च हो चुके हैं पर गंगा की सेहत सुधरने के बजाय और बिगड़ गई। एशिया के सबसे बड़े और गंदे सीसामऊ नाले को तो डायवर्ट किया जा चुका है, मगर सीवर लाइनों की सफाई और मरम्मत की पोल बारिश में खुल गई।

लिहाजा आनन-फानन में सफाई की अनुमति मांगी गई और नाले को दोबारा गंगा में खोल दिया गया। इस समय बिठूर से जाजमऊ तक के सारे नाले गंगा में गिर रहे हैं। इनमें 16 बड़े नाले हैं। अगस्त के बाद भी इन नालों से 250 एमएलडी (25 करोड़ लीटर) सीवेज सीधे गंगा में जा रहा है।

शासन से मांगी जा रही तारीख: कॉमन एफ्लुएंट प्लांट (सीईटीपी) और सीवर लाइनों की सफाई के लिए शासन से 15 सितंबर तक की मोहलत जल निगम ने मांगी थी। इसके बाद 30 सितंबर, 15 अक्तूबर, 30 अक्तूबर और 12 नवंबर की तारीख शासन से ली गई। अब जल निगम ने 15 नवंबर तक की मोहलत मांगी है।

चीयर्स डेस्क 

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