पीने वालों के आदर्श पुरुष थे खुशवंत सिंह

शराब पीने वालों के आदर्श पुरुष कौन हैं….थोड़ा सोचने की शायद ही जरूरत पड़े। जो जरा भी पढ़ा लिखा है वह फौरन खुशवंत सिंह का नाम लेगा। खुशवंत सिंह को शायद सभी लोग याद करते हैं, जो उनके विरोधी हैं और जो नहीं हैं, जिन्होंने उन्हें पढ़ा है और जिन्होंने  नहीं पढ़ा है। एक और वर्ग उन्हें याद करता है, वह है मयकशों, बादाकशों और मयख्वारों का…..! क्योंकि वह नियमित पीने वाले शख्स थे और आखिरी दिन तक उन्होंने पीने का अपना नियम नहीं तोड़ा। जब वह 80 के हो गए जो उन्होंने रोज शाम को एक पैग व्हिस्की पीने का नियम बना लिया था। उससे पहले वह दो पैग रोज शाम को पीते थे और उससे पहले तीन और उससे पहले कितने पीते थे याद नहीं। नियमित रूप से रोज़ शाम को व्हिस्की और बैडमिंटन, उनकी दिनचर्या का जरूरी हिस्सा थे।
खुशवंत सिंह बड़े बेबाक मर्द थे, किसी भी किस्म का पाखंड उन्हें छूकर भी नहीं गया था। जो करते थे, कहते थे और किसी से नहीं डरते थे। यह उन्हीं का कलेजा था कि उन्होंने बताया कि मरते समय उनकी मां की अंतिम इच्छा व्हिस्की थी। खुशवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा में ये बात लिखी है और बड़ी आत्मीयता से लिखी है। इसे लिखते हुए उन्होंने  किसी किस्म का कोई काम्प्लेक्स नहीं है। उन्होंने अपने घर में शराब पीने की परंपरा को बड़े उम्दा ढंग से बयान किया है कि किस तरह उनके पिता भी पीते थे। लिखा है कि पिता जब जीवित थे तो नियमित शराब पीते थे। शराब पार्टियां खुद ही करते थे। घर में शराब पीने का भी उन का एक समय निश्चित था। उनकी मां पीने पिलाने की सारी व्यवस्था रोज खुद करती थीं। लेकिन खुद शराब छूती तक न थीं। बाद में जब पिता जी का निधन हो गया, और वह अकेली रह गईं तो फिर एक दिन खुद पिता के शराब के समय रोजाना शराब पीने बैठने लगीं। उन्होंने शराब को अंतिम दिनों में अपनाया और हद तो यह है कि जब मृत्यु का समय आ गया तो उन्होंने अंतिम इच्छा हिचकी लेते हुए व्हिस्की की ही बताई।

खुशवंत सिंह जैसा मर्द आदमी ही इतनी जबर्दस्त आत्मकथा लिखने का साहस कर सकता है। अपने समाज में सच लिखना बहुत बड़ा जोखिम है, खुशवंत सिंह ये जोखिम उठा सकते थे क्योंकि वह बहुत बड़े बाप के बेटे थे, सबके बस की बात नहीं। अपनी आत्मकथा में उन्होंने  पार्टियों का जिक्र करते हुए एक जगह लिखा है कि एक कारोबारी ने शीशे की छत का स्विमिंग पूल बनावा रखा है, पार्टी के दौरान औरतें नंगी हो कर तैरती रहती हैं और नीचे से लोग शराब पी्ते हुए इन औरतों को देखते रहते हैं। इसके अलावा भी उन्होंने इस तरह के सैकड़ों किस्से लिखे हैं। जब वह लंदन में भारत के उच्चायुक्त थे, तब वहां की पार्टियों में कैसे कैसे लोग कैसी कैसी हरकतें करते हैं पीने के बाद, यह सब खुशवंत सिंह ने खूब मजे लेकर लिखा है। यह सब कुछ खुशवंत सिंह ही लिख सकते थे। वही जी सकते थे ये जिंदगी, एक भरपूर जिंदगी, एक जबर्दस्त मयख्वार, मयकश और बादाकश की जिंदगी। उनकी किताबों के नाम भी बड़े दिलचस्प हुआ करते थे, जैसे ’सेक्स स्काॅच और स्कालरशिप’ इसी तरह दूसरी किताब है ’खुशवंत सिंह, ऑन वुमेन, सेक्स लव एंड लस्ट’।

चीयर्स डेस्क

loading...
Close
Close