पीने का पानी चुनाव में बड़ा मुद्दा

महाराष्ट्र के मौसमी सूखे का प्रभाव भले इसके मराठवाड़ा क्षेत्र पर सबसे ज्यादा हो, लेकिन नए सियासी खिलाड़ियों की पैदावार में यह कतई पीछे नहीं है। यहां कभी विलासराव देशमुख और गोपीनाथ मुंडे आपस में टकराते देखे जाते थे, तो आज उनकी अगली पीढ़ियां ताल ठोंकती दिखाई दे रही हैं।

लड़ाई दो गठबंधनों के बीच

कभी निजाम हैदराबाद की रियासत का भाग रहा मराठवाड़ा 1960 में महाराष्ट्र राज्य का गठन होने के बाद इसका हिस्सा बना। आठ जिलों–औरंगाबाद, बीड, जालना, परभणी, हिंगोली, नांदेड़, लातूर और उस्मानाबाद में कुल 46 विधानसभा सीटें हैं। 2014 में कांग्रेस, राकांपा, शिवसेना और भाजपा की अलग-अलग लड़ाई में भाजपा 15, शिवसेना 11, कांग्रेस नौ और राकांपा आठ सीटें पाने में कामयाब रही थीं। इस बार लड़ाई भाजपा-शिवसेना गठबंधन और कांग्रेस-राकांपा गठबंधन के बीच है। मराठवाड़ा भले पिछड़ा रहा हो, लेकिन इसने कई दिग्गज नेता महाराष्ट्र को दिए। लातूर से शिवाजीराव निलंगेकर और विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री रहे, तो नांदेड़ के शंकरराव चह्वाण एवं उनके पुत्र अशोक चह्वाण भी मुख्यमंत्री रहे। बीड के गोपीनाथ मुंडे 1995 में पहली बार बनी शिवसेना-भाजपा गठबंधन सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे।

जलयुक्त शिवार योजना ने काफी काम किया

लेकिन इतने दिग्गज नेता देनेवाला मराठवाड़ा विकास के मामले में सूखे का सूखा ही रहा। ऊपर से पिछले पांच वर्ष में तीन वर्ष सूखे के झेलनेवाले इसी क्षेत्र में कुछ वर्ष पहले पीने का पानी भी ट्रेन से भिजवाने की नौबत आ गई थी। यही कारण रहा कि पांच वर्ष पहले आई देवेंद्र फड़नवीस ने 2015 से जलयुक्त शिवार योजना के जरिए गांव का पानी गांव में संचय करने की योजना शुरू की। इसके तहत काफी काम हुआ भी है। लेकिन क्षेत्र को इसका लाभ तभी मिल पाएगा, जब अच्छी बरसात हो, और जलयुक्त शिवार योजना के तहत तैयार तालाब, बावड़ी और नाले पूरी तरह भर जाएं। मराठवाड़ा को सूखे से उबारने के लिए भाजपा ने अपने इस बार के संकल्प पत्र में कोकण क्षेत्र से बरसात का वह पानी मराठवाड़ा में लाने की घोषणा की है, जो फिलहाल बिना उपयोग किए समुद्र में बह जाया करता है।

चीयर्स डेस्क 

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