पहाड़ का एक ठेका, ठेके में देस

जब रूद्रप्रयाग पहुंचे तो दिन तकरीबन ढल चुका था. गुप्तकाशी से आगे हमारी मंजिल की तरफ जाने वाली आखिरी बस आंखों के सामने निकल गई. हम लपके लेकिन दिन भर बैठे रहने के कारण जोड़ जाम हो चुके थे, बस सरक ही गई.

पहाड़ मे पहला दिन मैं सेलीब्रेट करना चाहता था लेकिन दुर्गा दादा किसी और गुन्ताड़े में थे. अभी आया, कह कर निकल लिए. बस अड्डे पर मैने तीन चाय पी, घुन लगी मठरियों को अखबार में लपेट कर, दादा के बैग में रखकर, दुकानदार के हवाले करने के बाद कस्बे की इकलौती दारू की दुकान लोकेट की. पुल पर जाकर नदी देखी तब कहीं वह प्रकट हुए, इस खबर के साथ कि चलो, एक आलीशान होटल मिल गया है. सामान रख कर फिर घूमा जाएगा.

यह बाजार में एक घर के ऊपर अधबना लॉज था जिसकी दीवारों पर उसका मालिक टोपी लगाए तराई कर रहा था. तीस रूपए किराए का जो कमरा हमें मिला उसका फर्श एक हफ्ता पहले बना था और बेहद ठंडा था. मैने कहा, दादा आपने तो कमाल कर दिया इसलिए सौ रूपए ढीले कीजिए ताकि दारू का बंदोबस्त किया जा सके. आपने दो सौ रूपए का शुद्ध मुनाफा कमाया है. दादा हल्के गरूर के साथ बोले कि कम्युनिस्ट राजनीति जो व्यावहारिकता सिखाती है उसमें से एक यह भी है. यह सीमित संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल करते हुए शोक को शक्ति में बदलने की कला है. मिडिल क्लास ‘बोरजुआजी’ की तरह हद से हद इसे बचत कह सकते हो. लंबी झिकझिक के बाद पचास रूपये मिले.

अब थोड़ी देर के लिए रूद्रप्रयाग देखने की बारी मेरी थी. कस्बे के इकलौते सिनेमा के सामने पहुंच गया जहां कोई बीस साल पुरानी फिल्म कुली चल रही थी. सामने जाली के भीतर ठेका था. हाल में ही शराब की बढ़ा दी गई कीमतों की लाचारी पियक्कड़ों की आंखों में दिखती थी. ठेके के भीतर अंग्रेजी की बोतलों की चहारदीवारी में देस दिखाई दे रहा था. एक बल्ब के होल्डर पर लाल लंगोट टंगा हुआ था जिसके नीचे एक लड़का बैठा किताब पढ़ रहा था. दीवार में बने ताखे में काली की एक मूर्ति थी जो शराब के ठेकेदार पर सदा सहाय रहा करती होगी. मूर्ति के बगल में एक चटका शीशा और एक मैल भरी कंघी थी जो दिन में कई बार लड़के के बाल संवारा करती होगी.

पहलवान सेल्समैन काउंटर पर बैठा था और उसका एक साथी बगल में बिना बेंट के एक अनगढ़ चाकू से अलमुनियम के तसले में आलू-टिंडे काट रहा था. चाकू की बेंट पर सुतली बड़े जतन से लपेटी लगती थी. यह माइनस जनाना गृहस्थी के बीच चलता सुख का कारोबार था. जाली के इस पार भीड़ थी. क्या पता कोई जनाना या लड़के की मां भी हो जो ठेके का शटर गिरने के बाद दृश्य में प्रवेश पाती हो. भीड़ की आंखों में देखते हुए मुझे लगने लगा कि ज्यादातर लोग अंदर रखी बोतलों को बस देखने के लिए दूर-दूर के गांवों से चलकर आए हैं. देख रहे हैं, देखे जा रहे हैं. अचानक एक हिलती है जो बाहर आकर उनसे मिलना चाहती है. झुरझुरी होती है और उन्हें याद आता है, फिल्म शराबी में नत्थू लाल की मूंछों को ग्लैमराइज करने के बाद वाले उस गाने में अमिताभ बच्चन क्या कहता था- “नशा शराब में होता तो नाचती बोतल.” कहा था कि नहीं.

रम का एक क्वार्टर, उस शाम हम लोगों के लिए काफी था. दुर्गा दादा के कान गरम हों और कोई जरा इसरार, एक बार फिर से इसरार करे तो अपनी भयानक आवाज में एक पुरानी बंदिश ‘काहे को मोरा जिया लै ले काहे को मोरा जिया दै दे’ गा दिया करते थे. मैं उन्हें रोमांटिक मूड में भेड़िया कह कर दाद दिया करता था फिर भी उस गाने के ढंग में कोई बात फंसी रहती थी. वे गाते तो लगता था, काठ पर खोद कर लिखा गया कोई यथार्थवादी प्रेम-पत्र पढ़ रहे हैं जिसका सार यह है कि जियरा के लेन-देन के गदेलेपन में क्यों पड़ते हो. अब तक जितने पड़े उन्होंने तकिए भिगोने, सुखाने, भिगोने के अलावा क्या किया? रौ में आ जाएं तो वे एक अवधी का बड़ा मारू गीत गाते थे जिसे सुनते हुए सीपिया टोन की एक फोटो भीतर बनने लगती थी- कोई जालिम जमींदार है जिसकी मूंछे झुकी हुई हैं, उसे रस्सी से बांध कर गरीब गुर्बा लोग काली माई के चौरे पर बकरे की तरह बलि देने के लिए लाए हैं. वे नाच-गा रहे हैं. यह मनौती जिस लाल रंग के झंडे के नीचे मानी गई थी वह नए जमींदार की तलाश में नए गांव की तरफ निकल गया है.

मिर्च काटने के बाद उन्होंने सिसकी ली. होंठ से नाक के बीच ‘एस’ के आकार की एक झुर्री फड़कने लगी यानि आज काहे को मोरा जिया….कहीं भीतर से चल चुका था. बस आने वाला था. सिसकी कई खतरों की एक साथ पूर्व सूचना थी. मैने बाकी माल एक बोतल में पानी के साथ लबालब भर कर जेब के हवाले किया और उनका हाथ पकड़ कर लॉज से बाहर निकल आया, “चलिए दादा, आज जरा पहाड़ की रात देखते हैं.”

रात के साढ़े दस बजे अलकनन्दा के पुल के ऊपर आसमान में एक कैलेंडर टंगा हुआ था. एक अकेला चीड़ का पेड़ था, चांद का विशाल गोला उठा, पेड़ जल गया, एक-एक पत्ती हीटर के एलीमेंट के घुमाव पर टंगी दहकने लगी. नीचे हहराती नदी थी. लहरों का फेन था और पुल के खंभों की थिरकती परछाई. कहीं आसपास एक रातरानी का झाड़ था जिसकी महक उड़-उड़ कर पानी के शोर के साथ चली आती थी. नदी के कगार पर जैसे-तैसे टिके दुकानों के पिछवाड़े चांदनी में चमक रहे थे. प्लास्टिक, चिथड़ों से ढके गलते पटरे जिनसे पानी टपक रहा था. लगा ये दुकानें अब गिरी कि तब गिरीं.

“दादा, आपने देखा है इन दुकानों में काम करने वाले छोकरों को. उन्हें किसी भी बात पर अचरज नहीं होता. आंख तक नहीं झपकाते?”

“अरे बच्चा, सालों के पेट में दाढ़ी है. हमको तुमको बाजार में बेच खांएं.”

पुल से ऊपर सीढ़िया थी जो अंधेरे में बुग्याल के बीच से किसी गांव की तरफ जाती होंगी. इतनी रात कोई सायकिल कंधे पर लादे चढ़ा आ रहा था. हम वहीं बैठ गए. नदी के उस पार पीली रोशनी वाली खिड़कियों में लोग सिनेमा के पात्रों की तरह नजर आ रहे थे. पार्श्व में उनकी गृहस्थी थी. अलकनंदा का संगीत था और संवाद हमारे. हम अंधेरे में बैठकर घुटकी लेते उन्हें देख रहे थे.

“देखना वह बुड्ढा जो कुर्सी से उठकर खड़ा हुआ है अभी दो-तीन बार ऊपर-नीचे हाथ हिलाएगा और फिर वहीं जाकर बैठ जाएगा.”

“वो लड़की जो किताब लिए इतराती घूम रही है देखना तब तक घूमती रहेगी जब तक सामने वाली खिड़की में बत्ती जलती रहेगी. लड़के-लड़कियों के कुल पंद्रह-बीस टाइप के सपने होते हैं वहीं हर पीढ़ी में सभी लोग बारी-बारी से देखते हैं और इसी तरह इतराते हैं.”

“वह औरत अभी कुल नौ बार अलग-अलग जगहों पर टंगे कपड़े छुएगी और थोड़ी देर बाद फिर छूने आएगी. मेरी बात गलत निकल जाए तो बताना”

” तुम्हें पता है, वो आदमी जो अपनी बीबी के साथ बैठा चाय या कुछ पी रहा है, वह इस समय क्या सोच रहा होगा… यह जो कटिया मारकर बिजली जला रखी है, कहीं छापा तो नहीं पड़ जाएगा.”

हम लोगों के सारे निष्कर्ष सच निकले और खिड़कियों की बत्तियां एक एक कर बुझने लगीं. शो खत्म होने पर भरपूर घूंट से फूले गालों पर विकसित संतोषप्रद मुस्कानों के हंसी में बदलने के बाद तय पाया गया कि दुनिया फिलहाल कई हजार सालों से बेहद तुच्छ कामों में तल्लीन जा रही है. सोने से पहले पुल तक जाकर एक बार और रातरानी की महक ली जाएगी.

अजीब बात हुई. हम लोगों की एक जोड़ा नाकें जाम हो चुकी थीं या रातरानी के पौधे ने अपनी जगह बदल दी थी या हवा ने खेल कर दिया था. जो भी हुआ रातरानी की महक नहीं मिली तो नहीं मिली. पुल के चारों कोनों पर पेशाब की आंखों में आंसू ला देने वाली तीखी झार थी. बस एक क्वार्टर के आधे में इतना नशा कि मैने सैंडिल उतार कर अपने पुराने करतब का अभ्यास शुरू कर दिया यानि पुल की रेलिंग पर चलने लगा. मेरा मानना था कि मैं ऐसा अक्खड़ शराबियों की तरह यह जांचने के लिए ऐसा करता हूं कि कहीं नशे में तो नहीं हूं. दादा का पुराना विश्लेषण था, मुझमें आत्महत्या करने के लिए जरूरी साहस का अभाव है जो शराब से थोड़ी मात्रा में मिलता है. मैं ऊची जगहों की तरफ इसीलिए खिंचता हूं और वहां इस तरह चलते हुए मरने के लिए किसी अनायास गलती के होने की प्रतीक्षा करता हूं. वे तटस्थ भाव से देखते रहे, बस एक बार कहा, “चूतियाराम जो आप कर रहे हैं सर्कस में उसके लिए चवन्नी तक नहीं मिलती.”

लखनऊ में वे रेजीडेंसी की मीनार पर इस तरह की कैटवॉक देखने के आदी हो चुके थे. उन्हें उठाकर मैं रेजीडेन्सी की चहारदीवारी फंदा दिया करता था. हम दोनों भोर तक स्मारक के बीच की मीनार पर गाते-पीते और दूर तक नजर आते शहर की समीक्षा किया करते थे.

(यात्रा वृत्तांत- ‘जहां आदमी की जात न हो’ का एक टुकड़ा)

अनिल यादव
हिंदी के वरिष्ठ लेखक और पत्रकार

loading...
Close
Close