पश्चिम यूपी जहां पीने का पानी हो चुका है जहरीला

हिण्डन नदी अपने उद्गम स्थल सहारनपुर से, मुज़फ़्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद व गौतमबुद्धनगर जनपदों से होते हुए करीब 260 किलोमीटर की दूरी तय करके यमुना नदी में मिल जाती है। इस बीच इसमें दो मध्यम दूरी की नदियाँ काली (पश्चिम) व कृष्णी भी क्रमशः मेरठ व बागपत  जिले में आकर मिलती हैं। पिछले एक दशक से हिण्डन व उसकी दोनों सहायक नदियाँ उद्योगों का गैर-शोधित तरल कचरा ढोने का साधन मात्र बनी हुई हैं।

पश्चिम यूपी उद्योग नगरी के रूप में जानी जाती हैं यहाँ कम से कम 200 छोटे बड़े उद्योग है जिनका गैर शोधित तरल कचरा यमुना की सहायक नदी हिंडक में बहा दिया जाता हैं। हिंडक नदी अब नदी न रह कर तरल कचरे को युमना नदी तक पहुंचाने वाले एक बड़े नाले की भूमिका में दिखाई देती है। इस कचरे के बहने से हिंडन नदी के आस पास बसे गांवों का पानी जहरीला हो गया है। और इसी जहरीले पानी को पीकर कई गांव के लोग कैंसर की चपेट में आ चुके हैं।

पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश के जिले बागपत के गागनौली गांव में करीब 100 लोगों की मौत कैंसर से हो गई है। अभी 15 लोगों को कैंसर है। कोई ऐसा घर नहीं जहां कोई मरीज न हो। अब तो जन्‍म लेते बच्‍चों को भी कोई न कोई बीमारी होती है। इस जहरीली नदी ने इन्हें तबाह कर दिया। ये हाल कृष्‍णा नदी का है। इस गांव के 1600 परिवार इस नदी में तैर रहे जहर को पीने के लिए मजबूर हैं, जिसकी वजह से गांव के लोग कमजोर हो रहे हैं, बीमार पड़ रहे हैं और मर भी रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि यह कहानी सिर्फ बागपत के गागनौली गांव तक सीमित है। बल्‍कि इस कहानी में पश्‍चिमी यूपी के 6 जिलों (सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद) के 154 गांव शामिल हैं। इन 154 गांव के रहने वाले लाखों लोग तीन छोटी नदियों के प्रदूषण से परेशान हैं। यह नदियां हैं- हिंडन, कृष्णा और काली नदी। गांव वालों का कहना है कि इन नदियों में इंडस्‍ट्री का कैमिकल वाला पानी बहाया जाता है, जो कि रिस-रिसकर भूगर्भ जल से मिल गया है। ऐसे में इलाके का भूगर्भ जल पूरी तरह से खराब हो गया है।

हिंडन नदी सहारनपुर के सिमलाना गांव से भी होकर गुजरती है। यह पानी सिर्फ लोगों को नुकसान पहुंचा रहा है। इससे खेती को भी नुकसान हो रहा है। अभी दो साल पहले गांव के ही एक किसान ने गन्‍ने की खेती की थी। इस पानी का इस्तेमाल करने के बाद उसकी फसल जल गई थी। इस बात से ही अंदाजा लग जाता है कि यह पानी कितना खतरनाक है। गांव में तीन साल पहले वॉटर टैंक लगाने के लिए सर्वे हुआ था। उसके बाद से कुछ हुआ ही नहीं। मजबूरी में लोग नालों से निकलने वाले इसी जहर को पी रहे हैं। कई लोगों गहरे बोर लगा रहे हैं तो अच्‍छा पानी मिल रहा है, लेकिन वो भी कबतक मिलेगा कुछ पता नहीं।

चीयर्स डेस्क 

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