तेज और टिकाऊ बनाने में जहर हो जाती है शराब

यूपी और उत्तराखंड में जहरीली शराब पीने से 114 व्यक्तियों मौत के बाद आम लोगों में इस बात की जिज्ञासा और गहरा गई है कि आखिर वह शराब कौन सी होती है जिसको पीते ही मौत हो जाती है। खासकर वह लोग जो शराब पीते हैं, उनकी जिज्ञासा कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। भारत के गांवों में देसी शराब का कारोबार कुटीर उद्योग तो नहीं लेकिन कुछ इलाकों में ऐसा ही है। जाति व्यवस्था वाले इस देश में कुछ जातियां इसी कार्य के लिए जानी जाती हैं। देसी शराब में जहर का कहर पहली बार नहीं टूटा है। इस धंघे में मिलावट का सिलसिला बहुत पहले से जारी है।  सबसे मज़े की बात यह है कि जहरीली शराब का इलाज भी शराब ही है। विशेषज्ञ डाॅक्टरों के मुताबिक जहरीली शराब यानि कि मिथाइल एल्कोहल का इलाज इथाइल एल्कोहल ही है। जहरीली शराब के एंटीडोट के तौर पर कई देशों में टैबलेट्स भी मिलती हैं लेकिन भारत में कहीं कहीं ही मिल पाती हैं। इसीलिए सामान्य अस्पतालों जहरीली शराब के मरीजों के इलाज में डाॅक्टर पहले नशा कम होने का इंतजार करते हैं, तब उसका इलाज सामान्य दवाओं से करते हैं।

देसी शराब जिसे आम बोलचाल में ’कच्ची दारू’ भी कहा जाता है उसके रासायन शास्त्र में कुछ भी असाधारण नहीं है। कच्ची शराब को अधिक नशीला बनाने के चक्कर में ही ये जहरीली हो जाती है। आम तौर पर कच्ची शराब को गुड़ और शीरे से तैयार करने का चलन है लेकिन इसमें यूरिया और बेशरम बेल की पत्तियां डाल दी जाती हैं ताकि इसका नशा तेज और देर तक टिकने वाला हो जाए।  पिछले कुछ वर्षों में शराब को अधिक नशीला बनाने के लिए इसमें ऑक्सिटोसिन मिलाने का चलन बढ़ गया है और यही आक्सीटोसिन अक्सर मौत का कारण बन जाता है। ऑक्सिटोसिन के बारे में विशेषज्ञ बताते हंै कि इससे नपुंसकता और नर्वस सिस्टम से जुड़ी कई तरह की भयंकर बीमारियां हो जाती है। इससे बनी शराब पीने से आँखों में जलन, खारिश और पेट में जलन हो सकती है और लंबे तक इसे पीने से आँखों की रोशनी भी जा सकती है।

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कच्ची शराब में यूरिया और ऑक्सिटोसिन जैसे केमिकल पदार्थ मिला देने से मिथाइल एल्कोहल बन जाता है जो वास्तव में मौत का कारण बन जाता है। रसायन शास्त्रियों के अनुसार मिथाइल शरीर में जाते ही रसायनिक प्रक्रिया बेहद तेज हो जाती है और शरीर के अंदरूनी अंग काम करना बंद कर देते हैं जिसके नतीज में तुरंत मौत हो जाती है। लेकिन कुछ लोगों के शरीर में ये रसायनिक प्रक्रिया तेज नहीं हो पाती है, उन्हें यदि समय पर अस्पताल पहंुचा दिया जाए तो उनकी जिंदगी को बचाया जा सकता है।
जिस रासायनिक द्रव्य को देसी दारू कहकर बेचा जाता है, वो 95 फीसदी तक विशुद्ध एल्कोहल है यानी बिना मिलावट वाला, इसे एथेनॉल भी कहते हैं। ये गन्ने के रस, ग्लूकोज, शोरा, महुए का फूल, आलू, चावल, जौ, मकई जैसे किसी भी स्टार्च वाली चीज के फर्मेन्टेशन (किण्वन विधि) करके तैयार किया जा सकता है। इस एथेनॉल को नशीला बनाने के लालच में देसी शराब के कारोबारी इसमें मेथनॉल मिला देते हैं और ये जहरीली तब हो जाती है जब इसके साथ ’काष्ठ अल्कोहल’, ’काष्ठ नैफ्था’ के नाम से मशहूर मेथेनॉल की मिलावट का संतुलन बिगड़ जाता है। मेथेनॉल जहरीला पदार्थ है जो पीने के लिए बिलकुल नहीं होता।

मेथेनॉल रसायन शास्त्र के हिसाब से सबसे सरल एल्कोहल है। सामान्य तापमान पर इसका रूप लिक्विड होता है। इसका इस्तेमाल एंटीफ्रीज़र (फ्रीजिंग प्वॉयंट कम करने के लिए किसी कूलिंग सिस्टम में पानी के साथ मिलाया जाने वाला लिक्विड) के तौर पर, दूसरे पदार्थों का घोल तैयार करने के काम में और ईंधन के रूप में होता आया है। यह एक रंगहीन और ज्वलनशील द्रव्य है जिसकी गंध एथेनॉल (पीने के काम में आने वाला एल्कोहल) जैसी ही होती है।
उपर दी गई जानकारी से इतना तो स्पष्ट हो गया है कि शराब कब और कैसे जहरीली हो जाती है। अब यह जानना भी ठीक रहेगा कि सामान्य शराब पीने पर शरीर कैसे रिएक्ट करता है। विशेषज्ञ डॉक्टर बताते हैं कि सामान्य शराब एथाइल एल्कोहल होती है जबकि जहरीली शराब मिथाइल एल्कोहल कहलाती है। कोई भी एल्कोहल शरीर में लीवर के जरिए एल्डिहाइड में बदल जाती है। लेकिन मिथाइल एल्कोहल फॉर्मेल्डाइड नामक के जहर में बदल जाता है। यह जहर सबसे ज्यादा आंखों पर असर डालता है। यह अंधा बना सकता है। किसी व्यक्ति ने बहुत ज्यादा शराब पी ली तो इससे फॉर्मिक एसिड नाम का जहरीला पदार्थ शरीर में बनने लगता है जो मस्तिष्क के काम करने की प्रक्रिया को बाधित कर देता है।

चीयर्स डेस्क

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