जहरीली शराब के लिए टैंकरों से घातक रसायन की चोरी

कई उद्योग धंधों में इस्तेमाल होने वाली मिथाइल अल्कोहल और शराब बनाने में प्रयुक्त होने वाली इथाइल अल्कोहल के बाइ प्रोडक्ट का बेजा इस्तेमाल ही दरअसल जहरीली शराब के उत्पादन का मूल स्रोत है। यूपी का आबकारी विभाग आज तक इसके अनुचित इस्तेमाल को रोकने की कोई भी समुचित रणनीति नहीं बना सका। आबकारी विभाग और उद्योग विभाग की इस सम्बंध में कोई संयुक्त रणनीति न होने का फायदा कच्ची शराब के व्यवसायी उठाते हैं।

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इस साल फरवरी में कुशीनगर और सहारनपुर में जहरीली शराब से होने वाली सैकड़ों मौतों के बाद भी आबकारी विभाग ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। आबकारी विभाग की प्रवर्तन इकाई से जुड़े एक अधिकारी के अनुसार इस कांड के बाद गठिग एसआईटी की जांच रिपोर्ट शासन को सौंपी जा चुकी है। इस अधिकारी के अनुसार एसआईटी की जांच रिपोर्ट में पड़ोसी राज्यों से टैंकरों में भरकर आने वाले मिथाइल केमिकल से बनी शराब के पीने से मौतें होने को अहम वजह बताया गया है।

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गौरतलब है कि मिथाइल अल्कोहल उद्योगों में प्रयुक्त होने वाला घातक रसायन है। यह जहरीला होता है। कपड़ा मिलों व अन्य उद्योगों में इसका इस्तेमाल होता है। सूत्रों के अनुसार गुजरात राज्य से टैंकरों में आने वाले इस रसायन के दुरुपयोग के मामले अक्सर पकड़ में नहीं आते क्योंकि यूपी से गुजरने के दौरान इन टैंकरों के ड्राइवर चोरी छिपे यह रसायन आसपास के गांव वालों को बेच देते हैं। शराब बनाने में प्रयुक्त होने वाली इथाइल अल्कोहल का बाई प्रोडक्ट चूंकि रस व गंधहीन होता है इसलिए इस जहरीले रसायन को इथाइल अल्कोहल मान लिया जाता है।

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यहां पर यह गौर करने की बात है कि यूपी में नोएडा, गे्रटर नोएडा, फिरोजाबाद, वाराणसी में यह बाइ प्रोडक्ट इन शहरों के स्थानीय उद्योेग जैसे कि वाराणसी मंे जरी उद्योग और फिरोजाबाद के कांच उद्योग में इस्तेमाल किया जाता है।

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नोएडा और ग्रेटर नोएडा में कुछ आईटी कंपनियों में भी इसकी खपत है। सूत्रों के अनुसार टैंकरों के ड्राइवरों से इन शहरों के आस पास के गांवों के लोग चोरी छिपे इसे हासिल कर लेते हैं और इससे भी अवैध देशी शराब बना देते हैं। इसे पीने से अक्सर मौत हो जाती है।

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यूपी सरकार ने इथाइल व मिथाइल अल्कोहल में फर्क करने के लिए मिथाइल अल्कोहल के रंग को हलका नीला करने का प्रावधान किया था। मगर औद्योगिक इकाइयों ने प्रदेश सरकार के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई।

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उनका तर्क था कि रंग मिला देने से वह अपने उद्योगों में इसका समुचित इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार की इस बाबत जारी अधिसूचना को रद्द कर दिया था। उसके बाद से इथाइल व मिथाइल अल्कोहल में फर्क करना सम्भव नहीं रह गया है।

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सहारनपुर चूंकि उत्तराखंड से सटा हुआ है। उत्तराखंड से सटे जिलों में काफी समय से कच्ची शराब पीने का प्रचलन है। उत्तराखंड का भगवानपुर औद्योगिक क्षेत्र है। यूपी के सहारनपुर की सीमा से लगे हजारों मजदूर रोजाना काम करने के लिए भगवानपुर आते जाते हैं।

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उत्तराखंड में कच्ची शराब कम दामों में मिलती है और दोनों राज्यों की सीमा के गांव बालूपुर और बिंदु खेड़ा में खुलेआम बिकती है। इसी तरह वाराणसी से मिर्जापुर रोड पर कच्ची शराब खुलेआम मिलती है और ये वर्षो से मिल रही है।

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गौर करें तो पता चलता है कि अगर गंभीर होकर जांच की जाए तो यूपी के पांच छह जनपद ही ऐसे हैं जहां अक्सर जहरीली शराब से मौतों की खबर आती है। लखनऊ के पड़ोस में उन्नाव औद्योगिक शहर है, सहारनपुर के पड़ोस में उत्तराखंड का भगवानपुर औद्योगिक क्षेत्र है।

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इसी तरह वाराणसी के पास ही मिर्जापुर और सोनभद्र औद्योगिक इलाके हैं और कुशीनगर के पड़ोस में नेपाल और बिहार की सीमा है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा औद्योगिक क्षेत्र होने के बावजूद अभी भी इन क्षेत्रों में गांव आबाद हैं और अपने पुराने परिवेश में ही आबाद हैं।

चीयर्स डेस्क

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