चुनौती बना पीने का साफ पानी मुहैया कराना

सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद भी राजस्थान के लोगों को पीने का साफ पानी मुहैया कराना आज भी चुनौती बना हुआ है। प्रदेश के ग्रामीण अंचल के लोग दूषित पानी पीने के कारण बेसमय ही अपंग बनने को मजबूर हो रहे हैं। प्रदेश में साफ पेयजल की योजनाओं के लिए पिछले सालों में ही केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत 4 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि आबंटित की है। राज्य में यह राशि खर्च होने के बावजूद ग्रामीण इलाकों में प्रदूषित पानी की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। प्रदेश में जल संरक्षण की दिशा में बहुत काम भी हुआ इससे जल संकट पर तो कुछ हद तक काबू पाया गया पर लोगों को स्वच्छ पानी पिलाना अब भी चुनौती बना हुआ है। प्रदेश की बड़ी आबादी अभी भी परंपरागत साधनों से ही पीने का पानी पी रही है जो अब प्रदूषित हो चुका है।

राजस्थान का हर पांचवां आदमी रसायन युक्त पानी पीने को मजबूर है। दूषित पानी पीने के मामले में राजस्थान देश में अव्वल प्रदेश की श्रेणी में है। इसके कारण लोगों में कई तरह की बीमारियां फैलने का अंदेशा हमेशा बना रहता है। अकेले बाड़मेर जिले में ही 15 लाख लोग दूषित जल पी रहे हैं। नागौर जिले में 12 लाख लोग दूषित जल पीकर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। केंद्रीय पेयजल स्वच्छता मंत्रालय की रिपोर्ट में राजस्थान को देश में सबसे ज्यादा प्रदूषित जल पीने वाला प्रदेश बताया गया है। यह रिपोर्ट पिछले साल जारी की गई थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश की 19575 बस्तियों में प्रदूषित पानी पीया जा रहा है। प्रदेश के कई इलाकों में फलोराइड युक्त पानी पीने से लोगों के कुबडे होने और खतरनाक बीमारियों की चपेट में आने का अंदेशा बना रहता है।

 प्रदेश के लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं करा पाने पर हाईकोर्ट भी सरकार से कई बार अपनी नाराजगी जता चुका है। प्रदेश के बांधों में शुद्व पानी नहीं होने पर लोक संपत्ति संरक्षण समिति ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर इस मामले को उठाया था। समिति ने बताया कि जयपुर में 31 बांध है, जिनमें से 28 सूख चुके है। समिति का कहना है कि जयपुर के किसी बांध में साफ पानी नहीं है। बांधों के बहाव क्षेत्र में भारी अतिक्रमण होने से भी बांध सूखने की कगार पर है।

चीयर्स डेस्क 

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