ग्रामीण महिलाओं की पानी के लिए जद्दोजहद

असल में पानी की समस्या ऐसी एक समस्या है जिससे देश का हर तीन में से एक नागरिक प्रभावित है। साल 2019 की शुरुआत में ही देश का लगभग 42 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सूखे की चपेट आ गया था। कमजोर मानसून भी पेयजल की समस्या को बढ़ाता है। सूखते जल स्त्रोत गिरता भूमिगत जलस्तर इसे भयावह बनाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल प्रत्येक ग्रामीण भारतीय महिला को पानी के लिए वजनी बर्तन सिर पर रखकर औसतन 14 हजार किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। एक ग्रामीण महिला का जीवन सुबह पानी भरने से शुरू होता है। वह पानी के लिए कई किलोमीटर पैदल चलती हैं। फिर पानी घर लाकर खाना बनाती हैं। पशुओं को चारा खिलाती हैं लोगों को भोजन देती हैं। इसके बाद फिर शाम को पानी लाने का वही चक्र शुरू हो जाता है। कई महिलाओं के लिए यह कुचक्र दिन में तीन-तीन बार के लिए होता है। रिपोर्ट कहती है कि भारत में जितनी दूर महिलाओं को पानी भरने के लिए जाना पड़ता है उससे हर साल करीब 15 करोड़ कार्य दिन का नुकसान होता है। इस कार्य क्षमता के नुकसान के कारण लगभग दस अरब रूपये का नुकसान प्रतिवर्ष भारत को होता है।

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके की रजौला गांव सतना जिला की सुमन 18 वर्ष  का आधा दिन तो पानी भरने में ही बीत जाता है। उनके गांव में एकमात्र हैंडपम्प है जो कि उसके घर से लगभग आधा किलोमीटर दूर है। उसे दिन भर में दो से तीन बार पानी भरने के लिए जाना पड़ता है। कई साल पहले उसकी पढ़ाई छूट चुकी है। हैंडपंप से घर के लिए पानी ला रही सुमन बताती है आधा दिन तो पानी भरने में ही बीत जाता है पढ़ाई-लिखाई की कौन सोचे कई बार तो लगातार आधा घंटे नल चलाने पर पानी आता है। सुमन जैसी लड़कियों और महिलाओं की संख्या भारत में करोड़ों में है जिनका रोज का काफी वक्त सिर्फ घर के लिए पानी की जरुरतें पूरी करने में जाता है। पानी के चलते मध्य प्रदेश की सुमन की पढ़ाई छूटी है लेकिन सतना से करीब 1500 किलोमीटर दूर गुजरात के कच्छ में साहब अली का पूरा गांव खाली हो गया है। साहब अली कच्छ में जिले के बन्नी ग्रास लैंड के जिस नानासराडा गांव में रहते हैं। वहां 650 से ज्यादा घर थे लेकिन अब सब खाली हैं सिवा साहब अली के। साहब अली कहते हैं इस गांव में मैं अकेला शख्स बचा हूं। गांव के सभी लोग यहां से चले गए यह अकाल बहुत खतरनाक है। गुजरात का कच्छ जिला लगातार तीसरे साल सूखे की चपेट में है और इस बार पिछले 20 साल के बाद ऐसा भीषण सूखा पड़ा है।

नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार फिलहाल देश की तीन चौथाई आबादी पेयजल की संकट से जूझ रही है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2020 तक दिल्ली और बेंगलुरू जैसे 21 बड़े शहरों से भूजल गायब हो जाएगा। इससे करीब 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। अगर पेयजल की मांग ऐसी ही रही तो वर्ष 2030 तक स्थिति और विकराल हो जाएगी। वहीं वर्ष 2050 तक पेयजल की इस विकराल समस्या के कारण भारत के सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी  में छह प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

भारत की पानी की समस्या से निपटने के लिए जानकार और विशेषज्ञ दो चीजों पर जोर दे रहे पेड़ लगाओ और पानी बचाओ। पानी की समस्या से बिना वाटर कंजरवेशन नहीं निपटा जा सकता है।

चीयर्स डेस्क 

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