खुद का चयन होता है शराब पीना

चीयर्स अपने आप में बेदह खनकता लफ्ज़ है। पूरे जोश, उत्साह के साथ बोला जाने वाला, पर शराब…….! शराब से क्या ऐसी ही खनक आती है, जरूर आती होगी। तभी तो लोग इसके दिवाने हुए फिरते हैं। हमारे जैसे लोग जिनके जीवन में शराब की कोई खास जगह नहीं रही कभी, उन्हें शायद ये अहसास नहीं होता होगा। ऐसा नहीं है, शराब के लिए कही से मैं पूर्वाग्रह से ग्रसित हूं या कोई एकतरफा राय है मेरी, पर पता नहीं क्यूं, कभी किसी गर्मजोशी का एहसास नहीं हुआ।

छोटी थी तो पापा को देखा, एक अनुशासित और कभी भी ना बहकनें वाले एक इंसान के तौर पर। तब वीकएंड कल्चर तो था नहीं, हां किसी छुट्टी की शाम या हफ्ते के आखिर में डेढ़ पैग पीते हुए देखा पापा को। उनका पैग तो कभी देखा नहीं, पर इतना जरूर पता होता था कि मेज पर अलग सलाद कटा रखा है तो गिलास भी वहीं कहीं आंड़ में रखा होगा। हम सब की नज़रों से दूर रखा गया होगा। पर कभी अहसास नहीं हुआ, कि पापा ने शराब पी है।

हमारे एक चाचा जी आते थे घर पर वो भी जरा सी पीते ही आपे से बाहर हो जाते थे। सारे रिश्तेदारों की बुराइयां उन्हें पीते ही याद आने लगती थीं, हम सबको वो बहुत बोर करते थे हमेशा। पापा के साथ हमें भी उनकी बातों से चिढ़ होती थी। पापा के उस रिलैक्स टाइम में राजकपूर की फिल्में, किशोर के गाने और पढ़ने लिखने की बातें, हमारी पढ़ाई और उससे जुड़ा राय मशविरा ही अहम था हमारे लिए। बीच बीच में मम्मी हंसी मजाक करके माहौल को हल्का बनाए रखती थीं। कभी कभी हमारे फूफा जी भी आ जाते थे पापा के साथ महफिल जमाने। तब पापा और फूफाजी बेहद शालीन तरीके से देश दुनिया की बातों पर चर्चा करते थे।

कहना ये चाहती हूं कि कभी भी कोई खराब अनुभव नहीं रहा शराब को लेकर। पापा ने कभी भी अपने अनुशासन को नहीं तोड़ा। अनुशासन से मतलब, कभी घर से बाहर नहीं पी और कभी जरूरत से ज्यादा नहीं पी। उनकी हरी आंखों के लाल डोरे हमेशा से ही बहुत अच्छे लगते रहे हम सभी भाई बहनों को, वो या तो उनके सुबह उठने के बाद होते थे या पी लेने के बाद…यही पहचान थी तब। पर पापा के बाद ऐसा कभी नहीं देखा। ये थी निजी जिंदगी से कुछ अनुभव पर वहीं पेशेवर जिंदगी में जब तक अखबारों में रही, तब तक शराब के बारे में कोई खास अनुभव नहीं हुआ। हां सुनते जरूर थे फलां बड़े सीनियर जर्नलिस्ट तो हैं पर रात में आठ बजते ही दफ्तर में रूक नहीं सकते, शराब आवाज देने लगती है उन्हें, पर कभी अपनी आंखो से देखा नहीं, तब का एक वाक्या जरूर याद है, वोडाफोन तब एस्सार समूह हुआ करता था, तब उन्होने लखनऊ के ताज होटल में एक प्रेस कान्फ्रेंस करवायी थी, कांफ्रेस का समय दोपहर का ही था। लंच से पहले बीयर सर्व कर दी उन्होंने, मेरी तो हालत खराब। तब शायद ठीक से बीयर और शराब का फर्क भी नही पता था। कान्फ्रेंस छोड़ के बाहर निकल गई। मन में यही डर था कि ये लोग (पत्रकार ही) पीने के बाद कहीं असभ्य न हो जाएं तो निकल लो यहां से। घिन नहीं थी पर एक डर हमेशा रहा।

लेकिन जब टीवी चैनल ज्वाइन किया तो वहां शराब कल्चर काफी पैर फैलाता हुआ दिखा। दफ्तर में कई बार पार्टियां होती थीं, पी तो पाते नहीं थे, पर किस्से ही सुनते थे। आज की एक प्रतिष्ठित एंकर जो तब एक छोटे से शहर से आई थीं, तब बहुत जूनियर हुआ करती थीं। दफ्तर में अलग और पार्टी में अलग ही रूप सुनते थे उनका। जानने वाले कुछ विश्वसनीय साथी बताते थे, मैडम, आदमी पानी भरते हैं उसके सामने, इतना तेजी से पीती हैं वो, ड़ांस भी गजब का करती हैं, बुरा नहीं लगा सुनकर कभी क्योंकि हमेशा से माना जैसे मेरा न पीना मेरा निजी फैसला है वैसे ही पीना उनका। दोनों का सम्मान होना चाहिए। पर कभी-कभी इस बात का अहसास जरूर होता था कि उन लागों को जो शराब की बैठकों के साथी होते थे, ज्यादा तवज्जो मिलने लगती थी, ये जरूर बुरा लगता था। हमारा काम और योग्यता, इन बैठकों के सामने कमतर दिखने लगती थी। पर क्या कर सकते थे। मन मसोस कर रह गए हमेशा। अपने दोस्तों की पार्टी में जरूर गये कुछ दो चार बार, पर सभी साथी इतने भरोसेमंद और समझदार थे कहिए मेच्योर थे कि कभी शराब के लिए किसी पर कोई दबाव बनाया नहीं गया। दोस्त और आदतें दरअसल आपका खुद का चयन होता है हमेशा। हां क्योंकि जब दिल्ली गए थे आईआईएमसी में पढ़ने तो हाॅस्टल में तकरीबन 30 लड़कियां थीं जिनमें से मेरी रूममेट लखनऊ की थी, भयानक पियक्कड़। अक्सर आंटी (हमारी वार्डन) रात में बारह बजे के आसपास नीचे से आवाज देतीं, रश्मि आकर इसे ले जाओ ऊपर।

डयूटी के अंदाज मे  उसे हाथ से सहारा देकर ऊपर लाती, उसके कपड़े बदलती, उसके जूते उतारती और उसे ओढ़कर सोने को कहती। पर जितनी देर में मैं उसका ये काम करती, वो बड़बडा-बड़बडा कर ढ़ेर कर देती, तुम साली किताबी कीड़ा, किताबों में मुंह देकर मर जाओगी। तुम्हें पता ही नहीं, जिंदगी में और भी बहुत कुछ है ब्ला…. ब्ला….ब्ला….! पर मैंने  कभी उसकी बात का बुरा नहीं माना, हंसती रहती थी। एक बार जब मुझे जांइडिस हुआ, तो वही मेरी रूम मेट, छुट्टी लेकर पूरे सात दिन मेरे पास बैठी रही, मेरा खूब ख्याल रखा, वो भी शराब का एक घूंट पिए बिना। मन की खूबसूरत वो मेरे लिए पहले भी थी पर उसकी इतनी केयरिंग करने के बाद मैं उसकी इज्जत भी करने लगी।

रश्मि अस्थाना

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