क्या मुमकिन है यूपी में शराब बंदी ?

एक ओर जहाँ शराब के दुष्परिणामों को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में गाहे-बगाहे आंदोलन जोर पकड़ते दिखते हैं। तो दूसरी ओर कल्याणकारी राज्य होने का दम भरने वाली सरकारों के लिए शराब राजस्व जुटाने का बड़ा जरिया शराब बन गई है। लखनऊ में शराब बंदी संयुक्त मोर्चा के कार्यकर्ता सम्मेलन में, सोमवार को यूपी में शराब पर पाबंदी लगाने के लिए कानून बनाने की मांग उठाई गई। वक्‍ताओं ने शराब को अपराध व भ्रष्टाचार की जननी बताया।

लेकिन वहीं अगर यूपी सरकार की बात की जाय तो सरकार अपनी नई आबकारी नीति को लेकर कितनी उत्साहित है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार ने अपने दो वर्ष के कार्यकाल में इस नीति में अमूल चूल परिवर्तन किये हैं । यही नहीं, योगी सरकार ने शराब से राजस्व बढ़ाने के लिए भी नित नए कदम उठाए हैं जिसमें वह कामयाब भी रही। इसी का नतीजा है कि अप्रैल 2018 से जनवरी 2019 के दौरान आबकारी राजस्व में 47.84 फीसद की अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।

सोमवार को लखनऊ के गांधी भवन में हुए सम्मेलन में शराब बंदी संयुक्त मोर्चा के संरक्षक आचार्य संतोषानंद ने कहा कि समाज में फैल रही की तमाम बुराइयों की सबसे बड़ी वजह शराब है। शराब से अपराध और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। उन्होंने प्रदेश में शराब की बिक्री व सेवन पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने के लिए कानून बनाने की मांग की। मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक सुल्तान सिंह ने कहा कि गांधी जयंती पर 2 अक्तूबर को प्रदेश के 50 जिलों से मुख्यमंत्री को जिलाधिकारियों के माध्यम से ज्ञापन भेज जाएंगे। इसमें प्रदेश में शराब पर रोक लगाने के लिये कानून बनाने की मांग की जाएगी।

उन्होंने चेतावनी दी कि सरकार ने कानून नही बनाया तो कार्यकर्ता महात्मा गांधी के बलिदान दिवस 30 जनवरी को मुख्यमंत्री आवास पर शराबबंदी सत्याग्रह चलाएंगे। वहीं यूपी सरकार शराब बंदी पर क्या कदम उठाएगी ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा, लेकिन अगर आबकारी नीति को लेकर यूपी सरकार की सक्रियता को देखा जाय  तो लगता नहीं है कि हाल फ़िलहाल सरकार शराब बंदी पर कोई फैसला लेगी।

चीयर्स डेस्क

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