क्या आप जानते हैं शरबतों का इतिहास

प्राचीन काल से ही पसंद किये जाने वाले ‘शरबत’ का नाम तो सभी ने सुना ही होगा और गर्मियों की चिलचिलाती धूप में इस पेय को आप घर पर भी अवश्य बनाते होंगे। तो आइये जानते हैं इसके इतिहास के बारे में। शरबत पश्चिम एशियाई और भारतीय उपमहाद्वीप का एक लोकप्रिय पेय है जो फलों या फूलों की पंखुड़ियों से तैयार किया जाता है। शरबत स्वाद में मीठे और आमतौर पर ठन्डे पेय को सांद्रित करके या पानी में मिलाकर परोसा जा सकता है।

शरबत के नाम से जाना जाने वाला यह पेय तुलसी के बीज, गुलाब जल, ताजे गुलाब की पंखुड़ियों, चंदन, बेल, गुड़हल, नींबू, संतरा, आम, अनानास आदि का उपयोग करके बनाया जाता है। यह ईरानी, भारतीय, तुर्की, बोस्नियाई, अरबी, अफ़गानी, पाकिस्तानी, श्रीलंकाई और बांग्लादेशी घरों का आम पेय है। रमज़ान के महीने में मुस्लिम लोग इसे पीकर अपना दैनिक उपवास तोड़ते हैं। भारत के केरल और तमिलनाडु क्षेत्रों में यह ‘सर्बथ’ के नाम से भी जाना जाता है।

शरबत अरबी शब्द ‘शारिबा’ से लिया गया है जिसका अर्थ है “पीना’ तथा यह 16 वीं शताब्दी में मुगलों द्वारा भारत में लाया गया था। इसका सबसे पुराना उल्लेख 12 वीं शताब्दी की एक फ़ारसी पुस्तक, ‘ज़खीरिये ख़्वारज़मशाही’ में मिलता है। लेखक इस्माइल गोरगानी ने अपनी पुस्तक में ईरान में उपयोग की जाने वाली शरबत की कई किस्मों का वर्णन किया है। बाबरनामा के अनुसार, शरबत बाबर का पसंदीदा पेय था और उसी ने इसे भारत में पेश किया। कहा जाता है कि इस ताज़ा पेय को बनाने के लिए वह अपने लोगों को हिमालय भेजता था ताकि वे वहां से ठंडी बर्फ लेकर आयें। अन्य मुग़ल बादशाह जैसे जहाँगीर, फालूदा शरबत के बहुत शौकीन थे। शरबत प्राचीन तुर्की में भी बहुत लोकप्रिय था और यहां इसे बनाने में उपयोग किए जाने वाले मसालों, जड़ी-बूटियों और फलों को ओटोमन महल में फार्मासिस्ट और डॉक्टरों की देखरेख में उगाये जाते थे।

चीयर्स डेस्क 

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