एल्कोहलिक या शराबी नहीं, शराब उपभोक्ता हैं पीने वाले !

शराब उपभोक्ता, ये शब्द नया नहीं है, लेकिन चूंकि चलन में नहीं है इसलिए नया लग रहा है। शराब पीने वाला व्यक्ति ही शराब उपभोक्ता है, लेकिन चूंकि वह स्वयं शराब पीने को लेकर तरह तरह की आशंकाओं और एक विशेष प्रकार को मनोग्रंथि का शिकार होता है, इसलिए उसे अभी तक शराब उपभोक्ता का दर्जा प्राप्त नहीं हो पाया।

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ऐसा क्यों है, पीने वाले आम तौर पर इस मामले में शांत रहते हैं। वैसे भी पीने वाले अक्सर सिर्फ पीने तक ही अपने आप को सीमित रखते हैं। समाज, पत्नी, बच्चे, परिवार, दफ्तर और दोस्त उनके लिए क्या सोचते हैं, इसका उन पर असर ज़रा कम ही पड़ता है। पीने वाले आम तौर पर मस्त तबीयत होते हैं। संकीर्ण नहीं होते, उदारता उनका सबसे पहला गुण होता है। उनकी महफिल में सब बराबर होते हैं, किसी के प्रति भेदभाव तो दूर की बात, ऊंच नीच भी नहीं होती। पीने वालों के बीच झगड़े भी दूसरे ग्रुप्स की अपेक्षा बहुत कम होते हैं। कहा ही जाता है कि एक बार जाम टकरा लेने के बाद जो दोस्ती होती है, वह बहुत पक्की होती है।

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कारपोरेट जगत में शराब के महत्व से इनकार कौन करेगा। शत प्रतिशत तो नहीं लेकिन अधिकांश कारपोरेट पार्टियों का मतलब ही काॅकटेल पार्टियों से होता है। युवकों की पार्टियां भी अब इसी तर्ज पर शराब के बिना नहीं होती हैं। लेखक, बुद्धिजीवी, पत्रकार और कलाकार लोग तो बिना शराब के रह ही नहीं पाते हैं। एक और जो नया वर्ग शराब का उभर कर सामने आया है, वह महिलाओं का है। भारत के उच्च वर्ग की बहुत सी महिलाएं तो पहले से सार्वजनिक रूप से शराब पीती दिखती थीं, अब खाते पीते मध्य वर्ग की अधिकांश महिलाएं भी सार्वजनिक रूप से शराब पीती दिखती हैं और ज्यादातर कामकाजी महिलाएं तो पीती ही हैं।

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इतना सब के बावजूद शराब पीने वाले को शराब उपभोक्ता का दर्जा क्यों नहीं मिला है या मिल पाया है। जबकि जैसे अन्य वस्तुओं के उपभोक्ता होते हैं उसी तरह से शराब का उपभोक्ता भी है। उसे भी वही अधिकार प्राप्त होने चाहिए जो अन्य वस्तुओं के उपभोक्ता के हैं। वास्तविकता तो ये है कि उसे भी इस प्रकार के सभी अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन वह अपनी उसी मनोग्रंथि के कारण कभी भी अपने उपभोक्ता होने के अधिकारों का इस्तेमाल नहीं करता है।

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शायरों और कवियों ने जो शब्द ’शराबी’ निकाल दिया है, या मेडिकल टर्म के रूप में ’एल्कोहलिक’ शब्द ईजाद हो गया है, वह शराब पीने वाले पर कतई लागू नहीं होते। शराब पीने वाला व्यक्ति न शराबी होता है और न ही एल्कोहलिक। एल्कोहलिक व्यक्ति वह होता है जो बीमार होता है और शराब के बिना जिसका रहना संभव नहीं होता। उसे शराब उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसी तरह शराबी वह होता है जो शायरों की फैंटेसी के कृत्यों पर खरा उतरता है। जबकि शराब उपभोक्ता इन सबसे अलग होता है। हर वह व्यक्ति जो शराब पीता है शराब उपभोक्ता है।

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ये बात शराब उपभोक्ता को पता है कि वह सरकारों को सबसे अधिक राजस्व देने वाला उपभोक्ता है। इसके बावजूद भी वह अपने उपभोक्ता हितों के प्रति बहुत शर्मीला और झेंपा हुआ सा दिखता है। क्यों, क्या शराब के प्रति अवधारणा नहीं बदली है। जैसे जैसे समाज में खुलापन आ रहा है, इंटरनेट की पहुंच हर व्यक्ति तक हो चुकी है, वैसे वैसे तमाम चीजों के प्रति नज़रिया बदल रहा है। ऐसे में जरूरी है कि शराब उपभोक्ता को भी अपने उपभोक्ता अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करनी चाहिए। पीने वाले को ही अपने अधिकारों के लिए सचेत होना होगा कि सबसे अधिक टैक्स देने वाले के साथ समाज और विशेष रूप से सरकार के अंग उदाहरण के लिए पुलिस, उसके साथ असंसदीय व्यवहार नहीं कर सकती जब तक कि शराब उपभोक्ता स्वयं समस्या नहीं बन जाता।

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चीयर्स डाॅट काॅम के सृजन का एक मकसद ये भी है कि शराब उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा का प्रयास। लेकिन इस प्रयास को भी सफलता तभी मिलेगी जब पाठकों और शराब उपभोक्ताओं का सहयोग चीयर्स डाॅट काॅम को मिले। चीयर्स डाॅट काॅम की सफलता ही शराब उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा भी है।

चीयर्स डेस्क

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