आरओ का पानी क्या वाकई में आपके लिए खतरनाक है

आरओ का पानी आज के समय में स्टेटस सिंबल के साथ ही रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हो गया है। आरओ (रिवर्स ऑस्मोसिस) वाटर, मतलब पूरी तरह से शुद्ध पानी माना जाता है। आरओ को लेकर यही सोच लोगों ने अपना ली है। बिना ये सोचे-समझे कि आरओ की जरूरत हमें है भी या नहीं। इसे देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सरकार को निर्देश जारी किए हैं कि जिन इलाकों में पानी में टीडीएस स्तर 500 मिलीग्राम से ज्यादा ना हो वहां आरओ पर प्रतिबंध लगा दिया जाए।
हालांकि, सरकार को इस पर अभी फैसला लेना है। लेकिन एनजीटी के इस निर्देश को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दरअसल, डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार बोतलबंद पानी या आरओ पानी लंबे समय तक पीने से आपके स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

NGT का निर्देश, कहा- जहां पानी ज्यादा खारा नहीं वहां पर आरओ पर प्रतिबंध लगाए सरकार

दरअसल, आरओ ऐसी तकनीक है जो पानी को फिल्टर करते समय अच्छे और बुरे दोनों ही मिनरल्स को निकाल देती है क्योंकि, मशीन को अच्छे-बुरे मिनरल्स की पहचान नहीं होती। वह पानी से जरूरी मिनरल्स को भी हटा देती है। यही कारण है कि दुनिया के कई देशों में इस पर प्रतिबंध लग चुका है। अगर आप सोच रहे हैं कि आरओ का वाटर आपकी हेल्थ को फायदा पहुंचा रहा है तो इसके फायदे, नुकसान और उपयोग में लाने की हिदायतों पर जरूर नजर डालें। इसके बाद ही फैसला करें कि आरओ जरूरी है या नहीं?
साफ, स्वास्थ्यवर्धक पेयजल उपलब्ध कराने के लिए रिवर्स-ओस्मोसिस (आरओ) जल शोधक प्रणाली को एक अच्छा अविष्कार माना जाता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि आरओ प्रौद्योगिकी का अनियंत्रित प्रयोग सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

क्या है दिक्कत

भारत में सबसे लोकप्रिय जलशोधकों में से एक आरओ प्रक्रिया खासतौर से दूषित पानी वाले इलाकों में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे विषाक्त पदार्थो का शोधन करने में कुशल हैं। इसके साथ ही घरेलू और औद्योगिक स्तर पर लगे आरओ सिस्टम इन विषाक्त पदार्थो को वापस भूजल जलवाही स्तर पर पहुंचा देते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आरओ के गैरपरीक्षित उपयोग को रोकने के लिए नियम बनाने की जरूरत है।
यह है टीडीएस
टीडीएस अर्थात टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स (कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटेशियम, सोडियम, बाइकार्बोनेट्स, सल्फेट्स और क्लोराइड्स)

TDS  खत्म करने में होती है पानी की बर्बादी
एक लीटर पानी आरओ पानी बनने में 2 लीटर पानी की जरूरत। जिससे एक लीटर पानी की बर्बादी होती है। आरओ के बाद बचा दूषित पानी बहाने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं। यह पानी पूरी तरह अनुपयोगी व हानिकारक होता है जो वातावरण को प्रदूषित करता है। आरओ की प्रक्रिया के बाद पानी से टीडीएस के साथ ही शरीर को फायदा पहुंचाने वाले बैक्टीरिया के साथ जरूरी खनिज कैल्शियम और मैग्नीशियम 90 से 99 प्रतिशत तक खत्म हो जाते है। क्लोरीनेशन से पानी का बैक्टिरिया खत्म होता है, लेकिन पानी की गुणवत्ता पर कोई प्रभाव नहीं। इस तरह का पानी लगातार लंबे समय तक पीने से आपके स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके लगातार सेवन से आपको हृदय संबंधी विकार, थकान महसूस होना, मानसिक कमजोरी और मांसपेशियों में ऐठन या सिरदर्द जैसे कई रोग हो सकते हैं।
ये हो सकती हैं समस्याएं
– ह्रदय संबंधी विकार
– थकान नमांसपेशियों में ऐंठन
– सिरदर्द
– शिशुओं में सर्टन डेथ

– ऑस्टियोपोरोसिस
– ऑस्टियोऑर्थराइटिस
– ऑस्टियोपीनिया
– रिकैट्स

बोरिंग के पानी को 45 टीडीएस पर करें मेंटेन
कम पानी वाले स्थानों पर शरीर 500 टीडीएस तक सहन कर सकता है, लेकिन सामान्य तौर पर 45 टीडीएस का पानी सबसे अच्छा होता है। कुछ समय पहले यूरोप में शिशुओं की अचानक मौत के कई मामले सामने आए थे। कारण था आरओ वॉटर का इस्तेमाल। इस पानी में शरीर के विकास के लिए जरूरी मिनरल्स मौजूद नहीं थे। इसी वजह से यूरोप के कई देशों ने इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। अगर भोपाल की बात करें तो नगर निगम द्वारा सप्लाय किए जा रहे पानी का टीडीएस शरीर को नुकसान नहीं पहुंचा सकता है। बोरिंग वॉटर के लिए आरओ जरूरी है, लेकिन जानकारी के अभाव में आरओ का टीडीएस मेंटेन नहीं रखा जाता। आरओ सिस्टम में ये ऑप्शन होता है कि आप इसकी मेंब्रेन को 45 टीडीएस पर मेंटेन कर सकते हैं। लोग आरओ सिस्टम को जानकारी के अभाव में जीरो टीडीएस पर मेंटेन रखते हैं। पानी के जरूरी खनिज लवण से वंचित होते है।

इम्यूनिटी सिस्टम होता है मजबूत
प्राकृतिक जल में मिनरल्स होते हैं। इससे इम्यून सिस्टम भी मजबूत रहता है। आरओ सिस्टम के कारण पानी से मिलने वाले जरूरी मिनरल्स की मात्रा में कमी के साथ ही इम्यूनिटी भी कमजोर हो रही है। बहुत कम उम्र में ही हड्डी और एलर्जी से संबंधित समस्याएं नजर आने लगी हैं। ये पानी में मौजूद कैल्शियम को भी कम कर हड्डियां खोखली करने लगा है। हम पेशेंट को आरओ वाटर के स्थान पर नॉर्मल प्युरीफायर का पानी, क्लोरीन या फिर उबला हुआ पानी पीने की सलाह देते हैं। पहले, वाटर प्युरीफायर कैल्सीफाइड होते थे, लेकिन अब बचपन से ही आरओ वाटर के उपयोग से हड्डी से संबंधित बीमारियां घेर सकती हैं।

चीयर्स डेस्क

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