आबकारी विभाग की जर्जर कार्यशैली, थाने भी नहीं खुले

यूपी में पिछले करीब सात वर्षों में जहरीली शराब पीकर 304 लोगों की मौत हो चुकी है, मौतों का ये सिलसिला चलता ही रहता है। इसी वर्ष फरवरी में कुशीनगर और सहारानपुर में जहरीली शराब से 114 लोगों की जान जा चुकी है। कब फिर से इस तरह मौतें होना शुरु हो जाएं, आशंका बनी रहती है क्योंकि गांवों में कच्ची शराब का बनना बंद नहीं हुआ है।

यूपी के आबकारी विभाग के अधिकारी दबी जुबान से इस तथ्य को स्वीकार भी करते हैं कि कच्ची, अवैध शराब के खिलाफ जिस प्रकार लगातार अभियान चलाए जाने की जरूरत है, वैसा नहीं चलाया जा पा रहा है। इनके अनुसार इसका मुख्य कारण आबकारी विभाग की जर्जर व्यवस्था है। आबकारी कानून के अनुसार विभाग को बहुत अधिक अधिकार ही नहीं हैं। पुलिस पर निर्भरता के कारण भी आबकारी विभाग को जो करना चाहिए नहीं कर पाता है।

हर साल यूपी का आबकारी विभाग औसतन 25 हजार करोड़ का राजस्व राज्य सरकार को देता है। इस वर्ष 2019-20 में 29,302 करोड़ का राजस्व देने वाले आबकारी विभाग के पास शराब माफियों से लड़ने के लिए संसाधन ही नहीं हैं। शराब के धंधे मे बड़े-बड़े माफिया तथा रसूखदार लोगों का दखल है। इन सभी से निपटने के लिए आबकारी विभाग के अधिकारीयों के पास न हाथियार हैं और न ही अधिकार। सीमित साधन और संसाधन वाला आबकारी विभाग सिर्फ सरकार का कमाऊ पूत बन कर रह गया है।

हालांकि अवैध शराब बनाने और बेचने वालों की धरपकड़ के लिए यूपी के आबकारी महकमे में कहने को तो स्पेशल स्ट्राइकिंग फोर्स भी है और प्रवर्तन दल भी। मगर, संसाधनों और समुचित अधिकारों के न होने के कारण ये दोनों अहम इकाइयां निक्रिष्य सी हैं। इन दोनो इकाइयों में तैनात आबकारी निरीक्षकों को सरकार की ओर से सीयूजी मोबाइल फोन तो दिए गए हैं, पर इनके जरिए अवैध शराब बनाने व बेचने वालों का सुराग लगाने के लिए सर्विलांस का अधिकार इन निरीक्षकों के पास नहीं है। ये अधिकार सिर्फ पुलिस के पास ही है।

डंडा भी नहीं देती सरकार

अवैध शराब बनाने व बेचने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए प्रदेश के आबकारी महकमे में हर मंडल और हर जोन में एक एक स्पेशल स्ट्राइकिंग फोर्स इकाई कार्यरत है। यूपी में 18 मण्डल और आबकारी विभाग के कुल पांच जोन हैं। सहायक आबकारी आयुक्त के नियंत्रण में चलने वाली प्रत्येक स्पेशल स्ट्राइकिंग फोर्स की इकाई में दो निरीक्षक, 4 हेड कांस्टेबल व 6 कांस्टेबल तैनात रहते हैं। मगर विडम्बना ये है कि छापेमारी व धरपकड़ के लिए उत्तरदायी इन आबकारी सिपाहियों के पास सरकारी लाइसेंसी हथियार नहीं हैं। हद तो ये है कि सरकार डंडा तक नहीं देती। हरियाणा की तर्ज पर यहां भी आबकारी थाने खोलने का प्रस्ताव फाइलों में दबा है, उस पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।


यह भी पढ़ें – 


आबकारी विभाग में मण्डल स्तर पर एक प्रवर्तन दल भी है। इसमें दो आबकारी निरीक्षक तैनात रहते हैं। प्रत्येक आबकारी निरीक्षक के अधीन दो हेड कांस्टेबल और तीन कांस्टेबल होते हैं। इन निरीक्षकों को भी मोबाइल फोन सर्विलांस का अधिकार नहीं है। ये टीम भी सरकारी हथियारों से वंचित हैं। यही नहीं आबकारी विभाग के कुल 4902 पदों में से केवल 3800 पद भरे हुए हैं, 1149 पद खाली चल रहे हैं जिन्हें भरने के प्रति भी विभाग गंभीर नहीं दिखता है।

जांच आयोग नहीं

जब तब अवैध शराब से बड़े पैमाने पर मौतें होती हैं। मगर इन मौतों की वास्तविक वजह और समस्या के समाधान के सुझाव सामने लाने के लिए आज तक प्रदेश सरकार ने कभी कोई जांच आयोग गठित नहीं किया। वर्ष 2015 में उन्नाव और लखनऊ के मलिहाबाद क्षेत्र में हुए जहरीली शराब कांड के समय भी ये मांग उठी थी जब 126 लोग मर गए थे, कि जांच आयोग बने लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी क्योंकि जहरीली शराब पीकर मरने वाले के प्रति समाज का रवैय्या खराब रहता है। कुशीनगर और सहारनपुर में इस साल 114 लोग फिर मर गए लेकिन हाल जस का तस है, इन मरने वालों के प्रति कोई भी संवेदनशील नहीं है।

चीयर्स डेस्क

loading...
Close
Close