बढ़ते, अवैध आरओ प्लांट पर नहीं हो रही कार्रवाई

इस बात पर शायद ही कोई ध्यान देता हो कि यूपी के अधिकांश छोटे शहरों जैसे गोंडा, सीतापुर, पीलीभीत, लखीमपुर, हरदोई, बिजनौर आदि में बिना भूगर्भ विभाग की अनुमति के छोटे आरओ प्लांट तथा वाहन धुलने के स्टेशन धड़ल्ले से चल रहे हैं। लखनऊ, कानपुर, गाजियाबाद, नोएडा, वाराणसी, मेरठ जैसे बड़े शहरों में भी यही काम हो रहा है लेकिन वहां कुछ कम्पनियों ने इन कार्यों की अनुमति ले रखी है। लेकिन हो सब जगह यही रहा है कि सब मिल कर धरती की कोख खोखली कर रहे हैं। पानी कितना इस्तेमाल होना चाहिए, इस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।

कुटीर उद्योग का रूप ले चुके पानी के इस गोरखधंधे पर एनजीटी ने भी आपत्ति दर्ज कराई है और मानक को पूरा न करने वाले ऐसे धंधों को बंद करने पर जोर दिया है। यूपी जल निगम की रिपोर्ट के अनुसार पूरब के कई जनपदों में शुद्ध पेयजल की गुणवत्ता बहुत कम हो गई है। नदियों के किनारे बसने वाले गांवों तथा शहरी क्षेत्र में आर्सेनिक, आयरन, फ्लोराइड व क्लोराइड सहित तमाम सूक्ष्म तत्वों की वजह से पानी पीने लायक नहीं रह गया है।

इन स्थितियों का लाभ उठाते हुए हर जिले में छोटे-छोटे आरओ प्लांट स्थापित कर दिए गए हैं। जो भी जरा सम्पन्न है, वह यह काम करने लगा है। इस पानी को वाहनों पर टंकियां रखकर 20 रुपये से लेकर 30 रुपये प्रति डिब्बा बेचा जा रहा है। आरओ का पानी बताकर बेचने से जहां धंधा करने वाले मालामाल हो रहे हैं। जबकि इनके दोहन से भूगर्भ में वाटर लेबिल गिरता जा रहा है। हालांकि जियोलॉजिकल विभाग ने कई जिलों में वाटर लेवल सुरक्षित बताया है लेकिन यह भी आशंका व्यक्त की है कि कुछ जिलों में अवैध रूप से जिस तरह से पानी का दोहन हो रहा है उससे भूगर्भ जल को खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
औसतन एक आरओ प्लांट से प्रतिदिन दस हजार लीटर पानी निकाला जाता है। इसमें पीने लायक केवल तीन हजार लीटर पानी ही बचता है, जबकि सात हजार लीटर पानी बेकार चला जाता है। इसी तरह वाहन धुलने वाले एक स्टेशन में भी प्रतिदिन औसतन 10 हजार लीटर पानी का दोहन होता है। यहां पीने लायक पानी पूरी तरह नालियों बह जाता है। पानी का रिचार्ज न होने से पानी का संकट बढ़ सकता है।

आरओ प्लांट लगाने के नियम

आरओ वाटर प्लांट के लिए जिला उद्योग केंद्र में पंजीकरण हो तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एनओसी होनी चाहिए। फूड कॉर्पोरेशन से भी एनओसी लेनी जरूरी है। इसके बाद प्लांट लगाने के लिए ब्लू प्रिंट तैयार कर, प्लांट लगाने के स्थान का स्टेटा क्या है, सुरक्षित जोन में है या क्रिटिकल जोन में है। चिल्ड करने का स्थान, बचने वाला पानी रिचार्ज हो रहा है या नहीं, पैन, आधार, जीएसटी आदि का कोरम पूरा करने के बाद प्लांट लगाने वाले को भूगर्भ विभाग में एनओसी के लिए आवेदन करना होता है। इसकी जांच होने के बाद यदि विभाग एनओसी दे तो आरओ प्लांट लगाया जा सकता है।

वाटर लेवल

भूगर्भ जल विभाग की मानें तो आरओ वाटर उस स्थान पर लगाया जा सकता है जहां पर पानी का स्तर सात मीटर से कम हो। यानि 50 प्रतिशत सुरक्षित हो। यदि इससे अधिक है तो वाटर लेवल क्रिटिकल जोन में माना जाएगा।

प्रतिदिन रिपोर्ट

नियम है कि आरओ वाटर प्लांट लगाने के लिए सभी को अपने यहां पीजोमीटर लगाना अनिवार्य है। इससे प्रतिदिन वाटर लेवल नापा जाएगा और इसकी रिपोर्ट भूगर्भ विभाग को देनी होती है। लेकिन यहां बिना एनओसी के 150 आरओ प्लांट संचालित हैं और किसी के यहां पीजोमीटर नहीं लगा है।

चियर्स डेस्क


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